अपूर्व

संवेदना और सरोकार से दूर जाता सृजन

यह एक अजीब सुबह थी
जो लिखना चाहूं, लिख नहीं पा रहा था
जो सोचना चाहूं, सोच नहीं पा रहा था
सूझ नहीं रहे थे मुझे शब्द
कामा, हलंत सब गैरहाजिर थे।

मैंने खोल दिए स्मृतियों के सारे द्वार
अपने भीतर के सारे नयन खोल दिए
दस द्वार, चौदह भुवन, चौरासी लोक
घूम आया
धरती गगन मिलाया
फिर भी एक भी शब्द मुझे नहीं दिखा
क्या खता हो गई थी, कुछ समझ में नहीं आ रह....

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