मधु कांकरिया

हर रंग में ढाका 

नहीं, मैं नहीं करती। मुझे लगता है कि एकदम शुरुआत में बलि का मतलब होगा, अपने भीतर की नकारात्मकता की, भीतर के पशु की बलि देना। बाद में शायद लोग इसे पशु बलि के रूप में देखने लगे होंगे। मुझे नहीं लगता कि अल्लाह मियां इतने निष्ठुर होंगे कि निर्दोष पशु की बलि को धार्मिक अनुष्ठान का नाम देंगे। आजकल ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनका मानना है कि क्यों निर्दोष जानवर की हत....

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