गीतांजलिश्री, बेहद तसल्ली से सृजनरत सर्जक हैं। मगर, हर समय ऐसा नहीं था। एक वक्त था, जब वे एक के बाद एक कहानी लिखती चली जा रही थीं और उनमें से कई, मुख्यतः, तब ‘हंस’ (राजेंद्र यादव द्वारा संपादित) में प्रकाशित हो रही थीं। मगर, इस प्रकट सच से जुड़े कुछेक अन्य पक्षों को देखते चलना भी जरूरी है। दरअसल, बचपन-कैशोर्य के दिनों में कथा-कहन के प्रति गहराता उनका आकर्षण, अरसे त....
