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धर्मिक होना अच्छा भी हो सकता है लेकिन अध्कि धर्मिक यानी, हाइपर रिलीजियस होना, हर हाल में खतरनाक है। यही एक व्याधि है, जो उन्माद पैदा करती है, ऐसा उन्माद जिसके अधीन होकर आदमी खुद के ही र्ध्म और समाज को नष्ट करने लगता है और अंत-अंत तक उसके अंदर यह भ्रम बना रहता है कि वह किसी अन्य र्ध्म को नष्ट कर रहा है। अध्कि अर्थात् हाइपर को मैं केवल समाजशास्त्राीय आधर पर व्याधि नहीं कह र....
