हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचक अरुण होता ने अपनी नवीनतम आलोचनाकृति ‘भूमंडलीकरण, बाजार और समकालीन कहानी’ महीनों पहले मुझे भेंट की थी किन्तु पढ़ने का अवसर अब मिला है। कुल इक्कीस अध्यायों और दो सौ तैंतालीस पृष्ठों में फैली तथा नेशनल पब्लिकेशंस, जयपुर से प्रकाशित यह पुस्तक निःसंदेह हिन्दी आलोचना के भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है। भूमंडलीकरण के बाद के बदलते परिद....
