मैं किताबें ख़रीदता हूं
उन्हें सजाता हूं
छूता हूं
उनके पन्ने उलटता-पुलटता हूं
देखता हूं
दिखाता हूं
पर उन्हें पढ़ नहीं पाता हूं
पूरा
मेरा दिमाग़ बिखर जाता है
पढ़ते-पढ़ते
हालांकि, मैं जानता हूं
कालजयी लेख....
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हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की भीड़ में अलग पहचान बनाने वाली 'पाखी' का प्रकाशन सितंबर, 2008 से नियमित जारी है।