सुमन केशरी

सुमन केशरी की कुछ कविताएं

कबीर पढ़ते-सुनते हुए

आत्मा की अतल गहराइयों से आती आवाज थी

जो झिस्सी (बूंदों) की तरह
उतरती जाती थी रेतीले ढूहों पर
रमता जाता था मन
ज्यूं रमता है जल धीरे-धीरे माटी में

माटी की काया घूम रही थी 
कुम्हार की चाकी में
उसकी दोनों हथेलियों के बीच
ले रही थी आकार
उसी तरह जैसे

हवा के झोंकों....

Subscribe Now

पूछताछ करें