मीरा मिश्र

मुझे जाना है सफेद बादलों के देश

वो  झर रही थी ठूंठ बनते पेड़ों के नीचे तने से बिछुड़कर संताप में घिरी। सरकते हुए हवा के थपेड़ों से ताकत लेती कई बार जमीन से उठकर तने तक जा लगती। फिर गिरती फिर कहीं दूर फिसलती हुई जा बैठती दो-चार कुपोषित असमय बूढ़ी झुर्रियों के बीच। तना वैसे ही तना हाथ हिलाता ठिठका बस देखता रहा अपलक। मिनट दो मिनट घंटे दो घंटे समय के साथ उसांसें भरता अलविदा कहता।
धीरे-धीरे सांसों के पट ख....

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