शैलेंद्र शांत

शैलेंद्र शांत की सात कविताएं 

आत्मरति

इस रति की
दो ही गति होती है

शर्म स्खलित होती है
और आत्मा या 
कि कह लें-
बुद्धि
लज्जित होती है। 

रंग

रंगों को
इतनी तंग नजर से 
न देखिए
मन की आंखों से 
पढ़कर देख लीजिए
मैल जमा है कहां
उसे साफ कीजिए

उस चोले के 
भोंडे किस्से हैं तमाम....

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