सुरेश कांटक

अंधेरा 

दरवाजे के चबूतरे पर चौकी पड़ी थी। उस पर बैठे थे सुमेसर। लंबा चौड़ा शरीर। तीस पैंतीस का जवान। साथ में थे मोहल्ले के एक उम्रदराज व्यक्ति, जो अपने ही सूबे के एक शहर में पशुपालन विभाग में बड़ा बाबू थे और फिलहाल छठ व्रत की छुट्टियों में गांव आए थे। उनकी उम्र पचास पार कर चुकी थी। आंखों पर पावर वाला चश्मा चढ़ चुका था। दोनों आपस में बतिया रहे थे। बड़ा बाबू सुमेसर की बातों में हां ह....

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