रवि शंकर सिंह

मोरा नैहर छूटो जाय

मोरा नैहर छूटो जाय


नियति ने मुझे जिस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया उस कंकड़ीली डगर पर घिसकर मेरे तलुए लहूलुहान हो गए हैं। अपने अतीत को याद करते हुए मैं जीवन की उन सर्पीली पगडंडियों पर वापस जाती हूं, जहां केवल कटीली झाडि़यां हैं, सघन वन हैं और लपलपाती जिह्ना वाले खूंखार जानवरों के झुंड अपने शिकार के इंतजार में घात लगाए हुए बैठे हैं।
मेरे जहन में ....

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