रजनी मोरवाल

भूख

भूख

कई रोज से बारिश रह-रहकर बरस रही थी। शहर की तबीयत किसी जुकाम लगे बच्चे की-सी हो रही थी जो अपनी नाक सुड़क-सुड़ककर हलकान हुआ जा रहा हो लेकिन राहत का कोई नाम नहीं था। मौसम की तबीयत अपने मियादी वक्त से अधिक बिगड़ी तो गली-मोहल्लों से गुजरना मुश्किल हो जाएगा। बारिश से जगह-जगह गड्डों के कारण यातायात तो अवरुद्ध होता ही था आस-पास का इलाका सड़ांध से गंधाता ....

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