चन्द्रकला त्रिपाठी

पूंजी समय की बर्बर भूमिका का  दृश्य और अदृश्य कीर्तिगान

 ‘न्याय और अन्याय में वर्तनी भर का फर्क रह गया है। अन्याय आपको एक झटके में खत्म कर सकता है और न्याय क्योंकि वह प्रिविलेज्ड है इसलिए, आपको जिबह करता है, धीरे-धीरे मारता है।’ (कीर्तिगान)
‘कीर्तिगान’ शीर्षक से आया चंदन पांडेय का यह उपन्यास ‘वैधानिक गल्प’ के जोड़ या विस्तार में आया दूसरा उपन्यास है। लेखक ने निपट उजागर वर्तमान समय के जटिल यथार्थ को उधेड़....

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