चंद्र

चंद्र की तीन कविताएं

चंद्र की तीन कविताएं


मैं किसान हूं, कवि नहीं हूं कि कल्पना से  काम चल जाएगा!

इससे पहले कि मैं जमीन पर से उठ जाऊं 
लेकिन क्या करूं, हाय!

मेरी कृशकाय आत्मा की पीली पत्तियां
गल रही हैं 
बर्फ के
निर्जन बियाबानों की तरह!

जहां पर हमने रो-रो कर बहाए थे खून-पसीने 
वहां कुदरत ने दे....

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