रोहिणी अग्रवाल

 रोहिणी अग्रवाल की तीन कविताएं 

नींद के अंधे कुंएं में डुबकी लगाने के बाद
गहरे उतरती चलती हूं दूर तक
जैसे जगत पर टिकी घिरनी से 
फिसलती रस्सी

रुपहले उजाले की टेरती दस्तकें
असह्य हो जाती हैं जब
खोल देती हूं आंखें
और दौड़ने लगती हूं वीराने में उगी पगडंडियों में

पगडंडियां 
हाथ पकड़ ले चलती हैं मुझे
भीतर-भीतर आंगन की तहों में खुलती
सूनी गलियों म....

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