प्रियदर्शन

शेष हुआ अब शंखनाद वह

हाल के वर्षों में उन्हें देखने में मुश्किल होती थी। सुनने में भी दिक्कत आती थी। लेकिन अशक्त पड़ती उनकी इंद्रियों का असर उनकी जीवनी शक्ति पर नहीं पड़ा था। वे तन कर चलते थे, तीसरी मंजिल पर बने अपने बेटे के फ्रलैट में बिना किसी सहारे के चढ़ते थे, रास्ते में रुककर गपशप भी कर लेते थे और किन्हीं आयोजनों में भी शामिल हो जाते थे। अपने अंतिम समय तक-यानी अस्पताल ले जाए जाने की मजबूरी से पहले-वे....

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